Sawal

आता नहीं है सवाल तो मुझे जवाब पूछ। पीड़ा की गिनती और दुःख का हिसाब पूछ।

बूंदों में टपकता है झरने का पानी वो। पियासी है गंगा हायती वो आब पूछ।

आता नहीं है सवाल तो मुझे जवाब पूछ…..

कागज के फूल चूमती तितली दीवानी ।कहा गया वो गेंदा, चमेली गुलाब पूछ।

आता नहीं सवाल तो मुझे जवाब पूछ……

सागर को समेटने की लल्सा ही मार गई।बूंदों को तरसती वो बोली तालाब पूछ।

आता नहीं सवाल तो मुझे जवाब पूछ …….

धरती को दाव पर लगाया एश की खातिर। हारे हुए जवारी को घाटा वा लाभ पूछ।

आता नहीं सवाल…..

सूरज ना उगने दे अंधेरे का अंधेर देख। चांद को खिलाने का मेरा वह ख्वाब पूछ।

आता नहीं सवाल….

धरती पर चैन बांटे, जीने की राह दे। ऐसा कोई ज्ञान ढूंढ ऐसी किताब पूछ

आता नहीं सवाल तो मुझे जवाब पूछ।

स्वाति ठाकुर

चाहत….

बिखरी पड़ी इस जिंदगी में एक दिन का सुकून चाहिए। मुझे मेरे चेहरे पर वह पहले जैसा जनून चाहिए।

मेरी बेखौफ वो हंसी की फिर से आवाज चाहिए। मेरे बेसुरे से गाने पर एक खूबूरत सा साज़ चाहिए।

मेरे गुम होते जा रहे सपनों की फिर से वो उड़ान चाहिए। झूठ,फरेब और धोके से दूर मुझे एक जहान चाहिए।

मेरे खोए हुए रिश्तो पर फिर से वह विश्वास चाहिए। मुझे मेरे प्यार पर सिर्फ मेरा एहसास चाहिए।

दूसरों की नज़रों में हमदर्दी नहीं मुझे मान चाहिए। मुझे मेरे नाम की अपनी एक पहचान चाहिए।

स्वाति ठाकुर

एजुकेशन लोन

बचपन से ही हमेशा स्टेज पर जाकर बोलना मुझे बेहद पसंद था।। स्टेज पर जाने का डर तो मानो खत्म हो गया था । ऐसे ही बोलते बोलते थोड़ा सा ध्यान पत्रकारिता की तरफ केंद्रित हुआ। जब कॉलेज में ग्रेजुएशन कर रही थी, तो घर से कुछ ही दूर जाकर एक लोकल न्यूज़ चैनल था। सोचा क्यों ना वहां जाकर नौकरी की जाए। लोकल न्यूज़ चैनल में बात की व उन्हें कहा कहा कि मुझे यहां न्यूज एंकर के तौर पर नोकरी करनी है। उन्होंने एक छोटी सी स्क्रिप्ट मुझसे बुलवा कर देखी और उन्होंने पसंद आ गई। उन्होंने मुझे पार्ट टाइम न्यूज़ एंकर की नौकरी दे दी। अब कॉलेज के बाद शाम के 4:00 बजे से 6:00 बजे तक मैं उस लोकल न्यूज़ चैनल में जाकर एंकर की नौकरी किया करती थी।

सोचा नहीं था कि यह पार्ट टाइम जॉब मेरी जिंदगी में एक अलग सी दिलचस्पी पैदा करेगी। मेरा इस फील्ड की तरफ ध्यान भडने लगा। तो सोचा कि जब ग्रेजुएशन खत्म करूंगी तो पत्रकारिता में ही अपनी मास्टर्स करूंगी। ग्रेजुएशन खत्म हुई तो मास्टर्स इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन करने का फैसला लिया।

मेरे अपने क्षेत्र में इस फील्ड को लेकर कुछ ज्यादा स्कोप नहीं था,जिस कारण यह कोर्स करने के लिए मुझे एक जगह से उठकर दूसरी जगह जाना था। घर पर बात की तो वह मुझे घर से दूर भेजने के समर्थन में नहीं थे। रोई, ज़िद की, मुझे जाना है, मास्टर इन मास कम्युनिकेशन ही करना है। तो पापा ने साफ-साफ बोल दिया कि तुम्हें करना है तो करो पर मेरी आर्थिक स्तिथि इतनी सही नहीं है कि मैं तुम्हें कर सकूं।

अभी यहां पर खुशी की बात यह थी कि घर से बाहर जाकर पढ़ने की इजाजत मिल गई है। और दुख की बात हुई थी कि पढ़ाई करने के लिए कॉलेज की फीस नहीं है। अजीब दुविधा में थी। तो ध्यान आया एजुकेशन लोन। घर के साथ ही बैंक में जाकर एजुकेशन लोन का पता किया। तो बैंक वालों ने लोन देने में कोई भी आपत्ति नहीं जताई। मैं बहुत खुश थी, मैंने जाते ही सबसे पहले कॉल अपने पापा को की कि पापा फाइनेंशली कोई दिक्कत नहीं है। बस आप मुझे भेज दो। मेरे पापा ने भी बात समझी और बैंक में मेरे ब्रोकर बन कर मुझे लोन दिलवाया और मुझे दिल्ली पढ़ने के लिए भेजा।

वहां से आते समय मैं उनको एक विश्वास दिला कर आई थी। कि पापा यह लोन में खुद खत्म करूंगी। वह बहुत खुश थे। मैं भी अपने परिवार की मुश्किलों को समझ कर और उसका एक अच्छा सा हल निकाल कर पढ़ने आ गई। उम्मीद है खुद से कि इस क्षेत्र में नाम कमा के सब को गर्व महसूस करवाऊंगी।

हॉस्टल का वो पहला दिन

पहली बार घर को छोड़कर जाने का एक्सपीरियंस कुछ अलग होता है। मेरी जिंदगी का यह पहला एक्सपीरियंस था,मेरी हॉस्टल लाइफ। सुना बहुत था कि हॉस्टल लाइफ में यह होता है, वो होता है, बड़ा मजा आता है, दोस्त बनते हैं और हॉस्टल लाइफ बड़ी यादगार रहती है। तो फिर अपना यह तजुर्बा याद करूं तो बात कुछ ऐसी थी कि जिस दिन घर वाले हॉस्टल छोड़ने आ रहे थे उस दिन यानि -29 जुलाई 2019, मैं पहली बार घर से बाहर इतनी दूर आई थी। जब मुझे परिवार वाले छोड़ कर जा रहे थे, तो झूठ नहीं बोलूंगी बहुत रोई थी। ऐसे लगा जैसे मेरी विदाई कर दी हो। पर शायद हर बच्चे को यही लगता है। हॉस्टल के कमरे में आई तो अपनापन सा नहीं था। अलमारी में अपना सामान रखा। फिर सोचा बाहर थोड़ा घूम के आती हूं।

कैंपस घुमा,अनजान चेहरे ,अनजान लोग और मन में वह अजीब सी एक घुटन फिर शाम हो गई ।8:00 बजे से 9:00 बजे खाने का वक़्त था । हॉस्टल की मेस में जाकर खाना खाया। झूठ नहीं बोलूंगी भूख बहुत थी पर दो निवाले से ज्यादा नहीं खा पाई। वो इसलिए क्योंकि बचपन से आदत है न मां के हाथ का खाने की, तो इस खाने का स्वाद बड़ा फीका सा लगा। उस दिन एक बात अचानक से समझ में आई कि कितने नखरे किया करते थे । आज खाना अच्छा नहीं बनाया,आज यह नहीं खाऊंगी, पर यहां कैसे बोलूं किससे बोलूं । यह सोच कर बहुत रोना भी आया और मां का तुरंत फोन भी आया।

मां से जब हेलो कहां तो उनका पहला सवाल था, “खाना कैसा लगा”, मैंने बोल दिया बहुत अच्छा था सब झूठ बोलते हैं कि मेस का खाना अच्छा नहीं होता। हमारी मेस का खाना तो बहुत अच्छा है।

हमारे घर पर परांठे कभी-कभी बनते हैं। और आदत भी नहीं परांठे रोज सुबह खाने की। पर हॉस्टल की मेस में में हर दिन सुबह पराठे बनते हैं। तो घर कि वो रोटी-सब्जी बड़ी याद आती है। और अब हाल कुछ ऐसा है कि धीरे-धीरे हॉस्टल का यह कमरा भी अच्छा लगने लगा है । आपने हॉस्टल के बेड के बिना नींद भी नहीं आती। घर से लाए हुए आचार के साथ,मेस के खाने में घर का स्वाद ढूंढा किया जाता है। देर रात तक जागने की आदत हो गई है। हॉस्टल के कमरे की बालकनी में बैठकर देर रात तक चांद को भी देखा करते हैं। पर एक बात जो घर से दूर रहकर जरूर याद आती है मेरी मां खाना बहुत अच्छा बनाती है।

सुल्तानपुर राष्ट्रीय अभ्यारण्य की यात्रा।

सुल्तानपुर राष्ट्रीय अभ्यारण्य का सबसे पहला प्रवेश गेट ।
सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान में जाने के लिए टिकट काउंटर से टिकट लेकर ही अंदर प्रवेश किया जा सकता है।

सुल्तानपुर नेशनल पार्क दिल्ली से 45 किमी व गुड़गांव से 15 किमी की दूरी पर स्थित है। विभिन्न प्रकार के पक्षी, घने पेड़ व झील से सुशोभित यह नेशनल पार्क बेहद सुंदर है। पार्क के अंदर जाते ही हरे- भरे पेड़ ,व चारों तरफ हरियाली देखकर मन बेहद शांत महसूस करता है। यह जगह हरी-भरी व खूबसूरत होने के साथ-साथ बेहद शांत है। पार्क में अंदर प्रवेश करते समय यह नहीं लगता कि यह जगह सचमुच हमें प्रकृति के साथ इतना करीब से रूबरू करवाएगी। परंतु यहां जाकर यहां की हर चीज आपको अपनी तरफ आकर्षित करेगी।चाहे वह पेड़ हो, हरियाली हो, वहां की झील हो, या चाहते पक्षी ।

सुल्तानपुर राष्ट्रीय अभ्यारण्य में स्थित झील का सुंदर नजारा।

पार्क में स्थित यह झील बेहद विशाल व खूबसूरत है। इतना ही नहीं यहां पर प्रकृति की खूबसूरती को ध्यान रखते हुए कई अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई है। पक्षियों की खूबसूरती को अच्छी तरह से निहारने के लिए यहां पर चार टावर भी बनाए गए। इन टावर की मदद से पर्यटक पूरी झील का व पक्षियों का नजारा ले सकते हैं। पर्यटकों की सुविधाओं के लिए यहां पर दूरबीन भी उपलब्ध करवाई जाती है, व यहां पर एक पुस्तकालय वह व्याख्या केंद्र भी स्थापित है। छोटे बच्चों के खेलने के लिए यहां पर चिल्ड्रन पार्क भी मौजूद है।

सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी
खाने की तलाश में उड़ता पक्षी
सफेद बगुला का यह चित्र अपने आप में ही कहानी दर्शाता है।

पक्षी किसे पसंद नहीं? जिस तरह पक्षी बेफिक्र होकर अपने पंख फैला कर आकाश में उड़ते हुए दिखते हैं तो हर किसी के मन में यह मंशा जरूर आती है कि काश हम भी पक्षी होते, हमारे भी पंख होते, तो जब मन करता पंख फैलाकर दूर देश घूम आते। खैर छोड़िए यह तो बात रही कल्पना। कल्पना की दुनिया को छोड़कर हकीकत की दुनिया में वापस आए तो बात करते हैं पक्षियों की,तो हम उनकी तरह उड़ नहीं परंतु उनकी खूबसूरती को देखकर उन्हें सराह तो सकते हैं। हरियाणा के सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान कुछ चुनिंदा जगहों में से एक ऐसी जगह है, जहां पर पक्षियों की खूबसूरती को बेहद बारीकी से देखा जा सकता है। इस राष्ट्रीय उद्यान में आपको कई तरह के पक्षी देखने को मिलेंगे,कुछ स्थानीय पक्षी जो यहाँ पाए जाते हैं वह हैं-बिल बत्तख, यूरेशियन थिक नीज़, छोटे बगुले, सफ़ेद गले वाले किंगफ़िशर, कबूतर, नीलकंठ, कॉमन हूप्स, इंडिया क्रेस्टेड लार्क्स, आदि। इतना ही नहीं मौसम बदलने के साथ-साथ भी यहां कई विभिन्न पक्षियों की आवाजाही लगी रहती है।

प्राकृतिक के रंगों का एक खूबसूरत नजारा
क्या इन्हे भी है घर की तलाश।
प्रकृति के बनाए हैं कुछ अनोखे रिश्तो का एक खूबसूरत नजारा ।

सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटन का अनुभव बेहद खूबसूरत था। यहां की मनमोहक खूबसूरती हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती है साथ ही यह जाकर हमें प्रकृति के बारे में कई अन्य जानकारियां भी हासिल होती है। जिस तरह से कई पक्षियों की प्रजातियां लुप्त होती जा रही हैं वही सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान जैसी मात्र कुछ जगहों पर इन प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है। इस स्थान पर जाकर एक अनोखा व मन को संतुष्ट कर देने वाला अनुभव मिलता है । जरूरत है, की इस राष्ट्रीय उद्यान की खूबसूरती के साथ छेड़छाड़ ना की जाए ,इससे इसी तरह से बरकरार रखा जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी यहां जाकर प्रकृति से उसी तरह जुड़ पाए ,जिस तरह से आज की पीढ़ी यहां कर प्रकृति व इंसानियत के रिश्ते को महसूस करती हैं।

सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान की राहें।

तो निकल पड़िये इस उद्यान की ओर चिड़ियों के मधुर संगीत का अनुभव करने, जो दिल्ली की बाहरी सरहद पर ही स्थित है। पर विश्वास रखिए कि यहां जाने का अनुभव आपका बेहद खूबसूरत और याद कर रहे।